रविवार, 2 फ़रवरी 2020

सभा की भीड़, बेरोजगार और बेरोजगारी


                   सभा की भीड़, बेरोजगार और बेरोजगारी


अगर आपको किसी नेता की सभा में उमडी भीड़ देखकर फख्र होता है तो पिछले 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को होने वाली यूपीएसससी लोअर परीक्षा की भीड़ भी देखना चाहिए था.

अगर और खुशी चाहिए हो तो रेलवे एनटीपीसी की परीक्षा में उमड़ी  भीड़ देखना था!

यूपीएसससी लोअर की 600 पदों के सापेक्ष 1100000 से भी ज्यादा लोगों ने आवेदन किया.

रेलवे की एनटीपीसी परीक्षा के लिए तो 2.5 करोड़ के लगभग आवेदन आए.

गत 22 सितंबर को हुई एचएसससी की परीक्षा में भी 16 लाख लोगों की भीड उमडी.

यूपी टेट, सीटेट, बीएड और स्पेशल टेट की परीक्षा में उमडी भीड़ भी किसी लोकप्रिय नेता की सभा में उमडी भीड़ से भी ज्यादा होती है.

खुश होने के लिए हमारे देश में काफी कुछ है, बेरोजगारों की भारी भरकम संख्या हमें मुफ्त में समर्थक और भक्त मुहैय्या करा देती है.

खुशियाँ तब भी होनी चाहिए जब लखनऊ और दिल्ली में कभी पेंशन के लिए कभी प्रमोशन के लिए जुडती लोगों को लाठियाँ मारकर भगाया जाता है.

खुशियाँ इस बात पर भी मनाई जा सकती है कि उत्तर प्रदेश में पिछले ढाई साल में पुलिस और टीचर के अलावा और किसी बिभाग में भर्ती नहीं की गई.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि हम दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों और डिप्रेशन में जीने वाले नौजवानों के देश हैं.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि बीपीएससी में 25 लाख रुपये में अधिकारी की सीट खरीदी जा सकती है.
खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि परीक्षा के अतिरिक्त छात्रों को धरना, प्रदर्शन, कोर्ट, कचहरी की भी तैयारी करनी पड़ती है.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि उत्तर प्रदेश की यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसरों की 50% तक सीटें खाली हैं.

2.5 लाख डाक्टरों, 1.5 लाख प्राथमिक शिक्षकों के पद खाली हैं.

खुशियाँ इस बात की भी कि उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के जेई 2013 का रिजल्ट 6 साल बाद भी नहीं जारी हो सका।

आप समर्थक बने रहिये, लाठी-डंडे खाते रहिए और खुश रहिए कि आपका नेता कितना लोकप्रिय है.      - सोशल मीडिया

                                  ★★★★★★

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ख्वाबों में जीते विद्यार्थी/प्रतियोगी की एक मर्म-कथा


                     ख्वाबों में जीते विद्यार्थी/प्रतियोगी की 
                                   एक मर्म-कथा

           19-20 साल की छोटी सी उम्र में गाव की पगडंडियों से उठ कर, एक गठरी में दाल, चावल, आटा बांध कर जब एक लड़का खड़खड़ाती हुई बस में अपने हौसलो केउड़ान के साथ बैठता है तब उसके दिमाग में बत्तियां जलती है जो बत्तियां लाल होती है या नीली होती है और यही सोंचते-सोंचते वह कब इलाहाबाद /नई  दिल्ली  पहुंच जाता है उसको पता ही नहीं चलता। फिर यहाँ से शुरू होती है जिंदगी की जद्दोजहद, नौकरी की तलाश।

              जब लड़का अपने कमरे में कदम रखता है उस दिन उसकी एक ऐसी साधना शुरू होती है जो कभी अकेला नहीं करता, जब वह फॉर्म डालता है तो उसकी माँ किसी देवी माँ की मनौती मान देती है, उसकी बहन मन ही मन खुश होती है। उसके पिता दस लोगो से इसका जिक्र करते है और जब उसका परीक्षा जिस दिन रहता है उस दिन माँ व्रत करती है, इस कामना के साथ की उसका लड़का आने वाले अपने पूरे जीवन भर फाइव स्टार होटल में खायेगा। 

               राजधानी के चकाचौंध में यहाँ लड़का कोचिंग करता है, अपने सीनियर, अपने दोस्त, अपने भाई आदि की सलाह भी लेता रहता है। अपनी तैयारी में धार देता हुआ आगे बढ़ता है। कुकर की बजती सीटियों के बीच मोबाइल फोन पर चलते मारवाड़ी व सपना चोधरी के गानो पर नाचना यहा हर कमरे की पहचान है। यहाँ का प्रतियोगी मैनेजमेंट भी बहुत अच्छा सीख लेता है। दस बाई दसके कमरे में, सब कुछबिल्कुल अपनी जगह रखा मिल जाएगा। अलमारी किताबो से भरी, एक तरफ कुर्सी और मेज, एक तरफ लेटने के लिए चौकी, एक तरफ खाना बनाने के लिए एक मेज, दीवारों पर विश्व के मानचित्र और उसके बगल में लगे स्वामी विवेकानन्द और डॉ कलाम के पोस्टर और दरवाजे के पीछे लगी मुस्कुराती हुई मोनालिशा का बड़ा सा पोस्टर और कमरे की छज्जी पर रखेरजाई और कंबल। ये सब यहाँ के विद्यार्थी का मैनेजमेंट बताने के लिए पर्याप्त है! 


              प्रतियोगी यहाँ अपने हर काम का टाइम टेबल बना के अपने स्टडी मेज के दीवाल के ऊपर चिपका के रखता है जिसमें यह तक जिक्र होता है कितने बजे अख़बार पढ़ना है और कितने बजे सब्जी लेने जाना है। ATP यहाँ के छात्रों की मुख्य सब्जी है , ATP यानि आलु , टमाटर, प्याज । कुल मिलाकर यहाँ के प्रतियोगी की जिंदगी कमोबेश एक सिपाही जैसी होती है।इस तरह तैयारी करते करते 3-4 साल बीत जाते हैं कुछ साथी चयनित होकर अपने अनुजो का उत्साह बढ़ा के चले जाते है। यहाँ मुखर्जी नगर ,  गाँधी विहार  , नेहरू विहार इलाहबाद -छोटाबगड़ा ,शिवकुटी ,गोबिंदपुर ,बेली ,टेलएयरगंज ,म्योराबाद ,मम्फोर्डगंज बलरामपुरहाउश ,बेली, कटरा ,एलनगंज ,जरजटाउन ,दारागंज सिविल लाइन जैसे इलाकों में शाम के वक़्त छात्रों का चाय के दुकान पर संगम लगता है, जहाँ हर जगह से आये छात्र साथ बैठ कर चाय पीते-पीते देश की दशा, दिशा और परीक्षाओं पर भी सार्थक बहस करते हैं। यहाँ के प्रतियोगी को जितना अमेरिका के लोगो को उसके भौगोलिक स्थिति के बारे में नहीं पता होगा उससे ज्यादा इनको पता होता है।यहाँ का प्रतियोगी जब अपने मेहनत के फावड़े से अपनी बंजर हो चुकी किस्मत पर फावड़ा चलाता है तो सफलता की जो धार फूटती है उसी धार से वह अपने परिवार को, समाज को सींचता है और इसी सफलता के लिए न जाने कितनी आँखे पथरा जाती है और प्यासी रह जाती है , लेकिन उस प्यास की सिद्दत इतनी बड़ी होती है कि एक अच्छा इंसान जरूर बना देती है।

                सौ बार पढ़ी गई किताब को बार-बार पढ़ा जाता है, जब याद हो चुकी चीजो को सौ बार दुहराया जाता है फिर भी परीक्षा हॉल में कंफ्यूजन हो जाया करता है, उस मनोस्थिति का नाम है यहाँ का विद्यार्थी। जब परीक्षा हॉल के अंतिम बचे कुछ मिनटों में बाथरूम एक सहारा होता है शायद वहा कोई एक दो सवाल बता दे उस मनोस्थिति का नाम है यहाँ का विद्यार्थी। जब खाना बन कर तैयार हो जाये तो उसी समय में दो और दोस्तों का टपक पड़ना और फिर उसी में शेयर कर के खाना इस मनोस्थिति का नाम है यहाँ का विद्यार्थी ।प्रतियोगी का संघर्ष का दौर चलता रहता है, कुछ निराश होने लगे प्रतियोगियों को तब कोई कन्धा सहारा बन के आ जाता है।

                जब उसकी निराशा बढ़ने लगती हैतो उस कंधे पर होता है रेशमी दुपट्टा। उसके बाद वो उस रेशमी दुपट्टे के आंचल में ऐसा खोता है कि तब उसे आप कहते सुन लेंगे कि वह इसके लिए nursing officer बन के दिखा देगा। इस तरह शुरू होता है इश्क़ का दौर, घूमना, टहलना, पढाई का एक से बढ़ कर एक ट्रिक अपनी गर्ल फ्रेंड को देना, इन सभी चिजों का ये एक दौर चलता है। मुँह पर दुपट्टा बांधा जाता है, हेलमेट भी पहना जाता है फिर भी शाम को कोई मिल जायेगा और बोलेगा, "अरे यार आज तुमको हमने लड़की के साथ राज मंदिर सिनेमा हॉल में देखा था "। कुछ समय बाद यह भी दौर खत्म हो जाताहै, लड़की के घर वाले उसके हाथ पीले कर देते है। फिर यह चुटकुला सुनने को मिल जाता है, जब मैं बीएड का फॉर्म लेने दुकान पर गया था तो वो अपने बच्चे को कलम दिला रही थी।यहाँ तैयारी का फेस भी बदलता रहता है, शुरू में माँ-बाप के लिए इंस्पेक्टर बनना चाहता है, उसके बाद गर्ल फ्रेंड के लिए IAS  बनना चाहता है और अंत में दुनिया को दिखाने के लिए वो कहता फिरता है कि मै दुनिया को दिखा दूंगा कैसे की जाती है सरकारी नोकरी की तैयारी!

               पर जब वो असफल हो जाता है तो लोग उससे बात करना नहीं पसन्द करते, क्योंकि उनके नजर में वह असफल है, लेकिन यक़ीन मानिये असफल प्रतियोगी अपनी असफलता को बता सकता है, उसकी कमियों से सीखा जा सकता है, जिससे इतिहास रचा जा सकता है। वैस ेइस शहर में हमने भी पूरे वनवास काटे हैं, यहाँ के तैयारी करने वाले प्रतियोगियों का यही मज़ा है। आप बौद्धिकता से परिपूर्ण हो जाते है बेशक सफलता मिले न मिले।...
             
                                      प्रस्तुति: सुरेंद्र  पांडेय (फेसबुक)

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

गुणवत्ता का ढिंढोरा: दाल में कुछ काला है या?...


दाल में कुछ काला है क्या?...

                         शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में 
                         उत्तर प्रदेश फिसड्डी घोषित!

                                            साभार- 'अमर उजाला'
                 

           उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा इन दिनों अक्सर मीडिया की सुर्खियों में रहती है!...ये सुर्खियां प्रायः शिक्षकों की कामचोरी, अक्षमता, अनुपस्थिति, लेट-लतीफी आदि की होती हैं! शिक्षकों को छोड़कर शिक्षा-व्यवस्था से जुड़े बाकी सभी नेता, नौकरशाह, अधिकारी, कर्मचारी, ग्राम प्रधान, गैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ आदि प्रायः सुयोग्य, चुस्त-दुरुस्त, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार बताए-दिखाए जाते हैं! या कम से कम शिक्षकों को छोड़कर अन्य किसी पर उंगलियां नहीं उठाई जातीं!..क्यों?

        शिक्षकों से सम्बंधित इस 'क्यों?' -सवाल के उत्तर से पहले उसके परिणामों पर गौर करना जरूरी है। क्योंकि समाज और अधिकारियों के कठघरे में खड़े किए जाते शिक्षक सजा पाने के हक़दार तर्क और न्याय की किसी कसौटी पर कसे बिना ही पहले से ही अपराधी घोषित किए जा रहे हैं! सजा भी देना शुरू हो रहा है। उदाहरण स्वरूप शिक्षकों की दिन में तीन बार हाज़िरी लगाने के लिए लाया जाने वाला 'प्रेरणा-ऐप' शिक्षकों पर बाध्यकारी बनाने की कोशिशें चल रही हैं। यह कहते हुए भी कि अधिकतर शिक्षक कर्मठ और ईमानदार हैं!...फिर?...'कुछ' के खिलाफ़ कार्रवाई न कर सब पर इस दुष्प्रेरणा का बोझ क्यों लादा जा रहा है? सब पर ..

        इन परेशानियों और परिस्थितियों में शिक्षक सोशल मीडिया पर तरह-तरह से अपना क्षोभ-आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं! कुछ व्यंग्य/बानगी दृष्टव्य है:


*आकस्मिक अवकाश लेने का नया application format.*
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*सेवा में,*
*खण्ड शिक्षा अधिकारी विo क्षेत्र .......जिला.......*

महोदय,
        _सविनय निवेदन इस प्रकार है ,कि प्रार्थी को 03 दिन बाद बुखार आने वाला है, जिस कारण प्रार्थी विद्यालय उपस्थित होने में असमर्थ रहेगा।अतः महोदय जी से विनर्म निवेदन है,कि बुखार आने से पूर्व प्रार्थी का  01 दिन का आकस्मिक अवकाश स्वीकृत करने की कृपा करें,धन्यबाद।_

                            *प्रार्थी*
                  एक दुःखी अध्यापक

★★एक अन्य संदेश:
अच्छी तानाशाही है , कर्मचारियों के टैक्स से मजा मारे नेता , कर्मचारी यदि अपनी सुविधाओं के लिए धरना रखे तो उन्हें नौकरी से ही निकाल दिया वाह रे वाह ।  अपनी सुख सुविधाओं को तो सारे नेता मिलकर सारे गीले शिकवे भुला कर बढ़ा लेते है । कर्मचारियों की सुविधाओं को जोकि उनकी सुविधाओं की तुलना में नगण्य होती है उसके लिए इनकी हालत पतली हो जाती है 🙏🙏😡😡


शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

जीने का शऊर


                               जीने का शऊर 


                                                        - गुरचरन सिंह

   
दर्द की झोल जब झेल सको,
कड़वे, मीठे बोल हो जाएं बेअसर
पी कर जहर 'गर बन पाओ तुम नीलकंठ
मिट जाए भेद जब अपने और पराए का
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !

लांघ जाए जब सारी हदें तेरे बरदाश्त की
पुलसिया तशद्दुद की इंतिहा हो जाए,
फिर भी अगर झांक सको
तुम उनकी आंखों में,
फिर भी अगर ला सको
खून सने अपने होंठों पर 
उनका सीना बेंधती मुस्कान,
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !

दो दिन से चूल्हा भी जला न हो,
दो मुठ्ठी आटा पा जाओ कहीं से,
फिर भी आ जाए याद अगर
भूख से बिलखते पडोसी के बच्चे
और एक मुठ्ठी आटा दे आओ उन्हें
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !

घर बाहर जब ज्ञान बंटे,
राजा तो बस राजा है,
वह कुछ भी कर सकता है,
जनता की औकात ही क्या
उसकी खिलाफत करने की ;
फिर भी अगर यह कह पाओ
बहते हैं मुर्दे धारा के संग,
फिर भी जो निकलो अकेले ही
चिल्लाते हुए " यूरेका यूरेका" की तरह
और कहो,"ये राजा तो नंगा है,
कर देगा ये सबको यह नंगा,"
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !

                         ★★★★★