जीने का शऊर
- गुरचरन सिंह
दर्द की झोल जब झेल सको,
कड़वे, मीठे बोल हो जाएं बेअसर
पी कर जहर 'गर बन पाओ तुम नीलकंठ
मिट जाए भेद जब अपने और पराए का
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !
लांघ जाए जब सारी हदें तेरे बरदाश्त की
पुलसिया तशद्दुद की इंतिहा हो जाए,
फिर भी अगर झांक सको
तुम उनकी आंखों में,
फिर भी अगर ला सको
खून सने अपने होंठों पर
उनका सीना बेंधती मुस्कान,
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !
दो दिन से चूल्हा भी जला न हो,
दो मुठ्ठी आटा पा जाओ कहीं से,
फिर भी आ जाए याद अगर
भूख से बिलखते पडोसी के बच्चे
और एक मुठ्ठी आटा दे आओ उन्हें
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !
घर बाहर जब ज्ञान बंटे,
राजा तो बस राजा है,
वह कुछ भी कर सकता है,
जनता की औकात ही क्या
उसकी खिलाफत करने की ;
फिर भी अगर यह कह पाओ
बहते हैं मुर्दे धारा के संग,
फिर भी जो निकलो अकेले ही
चिल्लाते हुए " यूरेका यूरेका" की तरह
और कहो,"ये राजा तो नंगा है,
कर देगा ये सबको यह नंगा,"
तो समझ लेना जीने का शऊर सीख गए !
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