रविवार, 31 मई 2020

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                              निबन्ध शब्द की व्याख्या और 
                      प्रारम्भिक (भारतेंदु युगीन) हिंदी निबन्ध



'निबन्ध' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु 'बन्ध' में 'नि' उपसर्ग लगाकर दो प्रकार से मानी जाती है- 1. नि+बन्ध+ल्युट् - 'निबध्यते अस्मिन् इति अधिकरणे निबन्धम्' अर्थात् जिसमें विचार बांधा या गूंथा गया हो ऐसी रचना, 2. नि+बन्ध+घञ् - निश्चितार्थेन विषयम् अधिकृत बन्धनम् - अर्थात निश्चित तात्पर्य से विषय को विचारों की श्रृंखला में बांधना।

यद्यपि 'निबन्ध' शब्द का प्रयोग बहुत पहले से होता रहा है, किन्तु वर्तमान काल में यह मुख्यतः अंग्रेजी के 'Essay' के अर्थों में प्रयुक्त होता है। आज हिंदी निबन्ध शब्द से तात्पर्य है- 'वह विचारपूर्ण लेख जिसमें किसी विषय का सम्यक विवेचन किया गया हो'(- 'बृहत् हिन्दी कोश' )। 'शब्द कल्पद्रुम' के अनुसार 'बद्धनातीति निबन्धनम्' अर्थात जिससे बन्ध जाएं वही निबन्ध है।

★'कुतार्किका ज्ञाननिवृत्तिहेतुः करिष्यते तस्यमया निबन्धः..' अर्थात कुतर्कों से ज्ञान की मुक्ति जिससे की जाती है इस तरह बांधी गई रचना निबन्ध है। - 'न्यायवार्तिक'

★ हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार-
" प्राचीन संस्कृत साहित्य में निबन्ध नाम का एक अलग साहित्यांग है। इन निबंधों में धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों की विवेचना है। विवेचना का ढंग यह है कि पहले पूर्व-पक्ष में ऐसे बहुत से प्रमाण उपस्थित किए जाते हैं जो लेखक के अभीष्ट सिद्धांत के प्रतिकूल पड़ते हैं। इस पूर्व-पक्ष वाली शंकाओं का एक-एक करके उत्तर-पक्ष में जवाब दिया जाता है। सभी शंकाओं का समाधान हो जाने के बाद उत्तर-पक्ष के सिद्धान्त की पुष्टि में कुछ प्रमाण उपस्थित किए जाते हैं। चूंकि इन ग्रन्थों में प्रमाणों का निबन्धन होता है इसलिए इन्हें निबन्ध कहते हैं।..." - 'द्विवेदी, हजारी प्रसाद, आचार्य : साहित्य का साथी'

मराठी के लेखक निबन्ध को 'सुहृद गोष्ठी' (सहृदयों की संगोष्ठी) का विकसित रूप मानते हैं। विशेषकर 'ललित निबन्ध' इसी श्रेणी में आते हैं।

हिंदी निबंध: भारतेंदु-युग


प्रारंभिक युग- भारतेन्दु युग:(1870- 1904) के प्रमख निबन्धकार और उनके प्रसिद्ध निबंध:

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र: ( 1850 - 1885 ):
'कवि वचन सुधा', 'हरिश्चन्द्र मैगज़ीन' पत्रिकाओं में उनके निबंध। इतिहासप्रसिद्ध सेठ अमीचंद की वंश-पंरपरा में उत्पन्न। उनके पिता बाबू गोपालचंद्र ’गिरिधरदास’ भी अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे। उस समय के पत्रकारों तथा साहित्यकारों ने 1880 ई. में उन्हे ’भारतेंदु’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

प्रमुख निबंध:

कश्मीर कुसुम
उदयपुरोदय
कालचक्र
बादशाह दर्पण
वैद्यनाथ धाम
सरयू पर की यात्रा
कंकण स्तोत्र
लेवी प्राणलेवी
वैष्णवता और भारतवर्ष
अंग्रेज़ स्तोत्र
ग्रीष्म ऋतु,
हम मूर्तिपूजक हैं,
जातीय संगीत,
पाँचवे पैगम्बर,
सूर्योदय,
बीबी फ़ातिमा,
भूकम्प,
अपव्यय,
खुशी,
एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न,
स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन,

विशेष:
भारतेंदु के निबंधों में विषय के अनुकूल उर्दू-फ़ारसी प्रधान (खुशी), संस्कृतनिष्ठ और बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है।

2. बालकृष्ण भट्ट: (1844 - 1914
) - 'हिंदी प्रदीप' (सम्पादक)
'भट्ट- निबंधावली', हिंदी का 'मोन्टेन' कहा जा सकता है।

प्रमुख निबंध:

आँसू,
मुछन्दर
'इंग्लिश पढ़े तो बाबू होय',
मेला ठेला,
वकील,
आत्मनिर्भरता,
आशा माधुर्य
खटका,
आत्मनिर्भरता
कल्पना शक्ति
तर्क
विश्वास
सहानुभूति
अनोखा स्वप्न

विशेष:
साधारण विषयों -आंख, नाक, कान, बातचीत, आँसू, चंद्रोदय आदि पर भी 'सर्वसाधारण में प्रचलित भाषा' पर श्रेष्ठ निबंध! अरबी-फारसी-संस्कृत-अंग्रेज़ी आदि के शब्दों का विषयानुसार प्रयोग।

3. प्रताप नारायण मिश्र: (1856 - 1964 )- 'ब्राह्मण' नामक मासिक पत्र निकाला। भारतेंदु के पदचिह्नों पर चलने वाले।

प्रमुख निबंध:

बात,
धोखा,
आप,
पुच्छ,
रिश्वत,
बेगार,
होली,
वृद्ध,
भौं,
दांत,
समझदार की मौत है,
टेढ़ जानि शंका सब काहू
‘आत्मीयता’,
‘चिन्ता’,
‘मनोयोग’

विशेष:
हास्य-व्यंग्य प्रियता के साथ गम्भीर चिंतन। मुहावरों-कहावतों का प्रचुर प्रयोग। वार्तालाप स्वच्छंद शैली। जन साहित्य को जनभाषा में।

4. बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन' : (1855 - 1923)- 'आनंद कादम्बिनी' पत्रिका के सम्पादक।

प्रमुख निबंध:

सम्पादकीय,
सम्पत्ति सीर,
हास्य,
हरितांकुर,
विज्ञापन
वीर बधूटियां
‘हमारी मसहरी’
‘हमारी दिनचर्या’
‘फागुन’,
‘मित्र’,
ऋतु-वर्णन

विशेष:
मनोरंजक लेख
1.प्रेमघन जी अपने निरालेपन के लिए याद किए जाते हैं। उनका उद्देश्य यह नहीं था कि उनकी बात साधारण समाज तक पहुंचे, उसका मनोरंजन हो या उसके विचारों में परिवर्तन हो। कलम की करामात दिखाना ही उनका उद्देश्य था। वह स्वाभाविक, प्रवाहमय, सुबोध भाषा नहीं लिखते। बल्कि शब्दों की जड़ाई करते थे। (विकीबुक्स)
2. वाणभट्ट की 'कादम्बरी' को गद्य का आदर्श मानते थे।
3. 'अनुप्रासमयी, आलंकारिक एवं गुम्फित शैली में दीर्घ वाक्यावली इनकी विशेषता थी..' - डॉ. विजयेंद्र स्नातक

5. अम्बिकादत्त व्यास: (1858 - 1900)
- मूलतः संस्कृत भाषा के पण्डित। काशी से 'वैष्णव-पत्रिका' (1884 ई.) का आरम्भ इन्होंने किया था, जो बाद में 'पियूष-प्रवाह' नाम से साहित्यिक पत्रिका में रूपांतरित हो गयी। ‘काशी कविता वर्धिनी सभा’ द्वारा 'सुकवि' की उपाधि से सम्मानित। 'गद्य और पद्य में 50 से अधिक पुस्तकें' ( - 'काशी कथा, साहित्यकार' )। इनके निबंधों का संग्रह 'साहित्य नवनीत' नाम से प्रकाशित हुआ है।

प्रमुख निबंधः

धैर्य,
क्षमा
ग्रामवास,
नगर वास 
 
6.बालमुकुंद गुप्त: ( 1863 - 1907)-

इन्हें भारतेंदु युग के अलावा कुछ समीक्षक द्विवेदी युगीन भी मानते हैं। इन्होंने कई उपनामों से निबंध लिखे। इनमें आत्माराम, शिवशम्भु शर्मा उपनाम विशेष प्रसिद्ध हैं।

'गुप्त-निबंधावली' में इनके निबंध संग्रहीत हैं। 'शिवशम्भु का चिट्ठा' नाम से लिखे गए चिट्ठों के रूप में इनके निबंध विशेष प्रसिद्ध हैं। 'भारत मित्र' पत्र में उनके अधिकांश निबन्ध प्रकाशित हुए थे!

प्रमुख निबंध:

बनाम लार्ड कर्जन ( भारत मित्र, 11 अप्रैल, 1903)
श्रीमान का स्वागत ( भारत मित्र, 26 नवम्बर, 1904)
वाइसराय का कर्तव्य (भारतमित्र', 17 सितम्बर, 1904)
पीछे मत फेंकिए ( भारतमित्र', 17 दिसम्बर,1904 )
आशा का अंत ( भारतमित्र', 25 फरवरी, 1905)
एक दुराशा ( भारतमित्र',18 मार्च, 1905)
विदाई संभाषण (भारतमित्र', 2 सितम्बर, 1905)
बंग विच्छेद ( भारतमित्र', 21 अक्तूबर, 1905 )
लॉर्ड मिंटो का स्वागत ( भारतमित्र', 23 सितम्बर, 1905 )
मार्ली साहब के नाम ( भारतमित्र', 16 फरवरी, 1907)
आशीर्वाद ( भारतमित्र', 30 मार्च, 1907)
शाइस्ताखाँ का खत-1(भारतमित्र', 25 नवम्बर, 1905 ), अज जन्नत
शाइस्ताखाँ का खत-2 ( भारतमित्र', 18 अगस्त, 1906 ), अज जन्नत
सैयद अहमद का खत ( भारतमित्र', 9 मार्च, 1907 ), अज जन्नत

विशेष:
1. बालमुकुन्द गुप्त के निबंधों में जैसा व्यंग्य, कटाक्ष, हास्य और विनोद मिलता है, वैसा उनके पूर्व दृष्टिगोचर नहीं होता।

2. आत्माराम नाम से लिखे गए इनके निबन्ध विवेचना की कोटि में आते हैं। गुण-दोष विवेचन इन निबंधों की प्रमुख प्रवृत्ति है।

3. शिवशम्भु शर्मा नाम से लिखे गए निबंध प्रमुख रूप से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ राजनीतिक व्यंग्य हैं। इनका हिन्दी गद्य और निबन्ध विधा के विकास में विशेष योगदान है।

भारतेंदु युगीन निबंध- टिप्पणी:

1.राजा शिव प्रसाद 'सितारेहिंद' -'राजा भोज का सपना' (1889 ई.) - हिंदी का प्रथम मौलिक निबंध भी कहा जाता है। यद्यपि इस पर मतैक्य नहीं है।

2. भारतेंदु युग के अन्य निबंध लेखकों में राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह, काशीनाथ खत्री, गोविंद नारायण मिश्र, भीमसेन शर्मा, किशोरीलाल गोस्वामी तथा तोताराम भी उल्लेखनीय हैं।

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सोमवार, 18 मई 2020

Solidarity with Nationwide Strike Call- FEDCUTA

Press Release: 17 May 2020

  • The Federation of Central Universities Teachers Associations (FEDCUTA) opposes attempts to subvert Labour Laws and to surreptitiously implement the NEP.


The FEDCUTA expresses its strong opposition to the unabashed subversion of existing labour laws and the implementation of the NEP when the country is facing a serious health crisis. It expresses its solidarity with the nationwide strike call issued by trade union bodies. 

Amidst the crisis of the COVID-19 pandemic, when educational institutions, factories and other business establishments are shut in the country, and lakhs of workers face the brunt of employment and are out on the streets, the Government’s priorities seem to be focused on protecting the interests of the big corporates. States after states are dismantling existing labour laws. Indications are there that the New Education Policy will also be implemented very soon. All of this suggests that the interests of big capital need to be protected at all costs.

For several years now, the Central Govt has been attempting to bring about changes to the labour laws. One Bill has already been passed in Parliament and another Code is awaiting approval before the Select Committee, where some members have opposed it. In such a scenario, the Central Government is trying to dismantle existing labour laws through State Governments of UP and MP. The latter has issued an Order to suspend all labour laws for 1200 days. 6 other states have increased the working hours from the internationally accepted 8 hour norm to 12 hours. Apart from this, the writing on the wall indicates that other states would also be taking similar steps.

Subverting the labour laws in such insidious ways is not only unlawful but it also constitutes a cruel attack on the rights of the working people. The right to unionise and to take recourse to collective bargaining is being trampled upon. The economic condition of workers is already bad and their ability to buy essential goods is already very low, which is reflected in the economic slump that we see. Most economists believe that government investment in the public sector must increase in order to overcome the economic crisis. What we see instead is that even in times of such a crisis the Central Government is keen on protecting the interests of big business by attacking the rights of the working class.

One sees a similar story playing out in the field of higher education. Permanent appointments have not taken place for years. Teachers have been denied promotions for over a decade. Contractualising of jobs is on the increase. Now, with the implementation of the NEP, educational institutions will be handed over to Boards of Governors (BOGs). All State and Central Universities and Colleges will be declared autonomous. Unions will become a thing of the past. Commercialization and privatization of educational institutions is the news of the day. All this is happening when people are cooperating with the Government in times of this crisis by implementing the lockdown. Instead of focusing its attention on getting the country out of the current crisis, the Government has shown its intent very clearly – that of protecting private interests.

The FEDCUTA demands from the Central Government that it issues instructions to State Governments to not effect any changes to the labour laws. The FEDCUTA also warns the Government from misusing the present crisis to implement the NEP. It will have disastrous consequences for education and for the country at large.

Rajib Ray, President
D K Lobiyal, Secretary

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

सभा की भीड़, बेरोजगार और बेरोजगारी


                   सभा की भीड़, बेरोजगार और बेरोजगारी


अगर आपको किसी नेता की सभा में उमडी भीड़ देखकर फख्र होता है तो पिछले 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को होने वाली यूपीएसससी लोअर परीक्षा की भीड़ भी देखना चाहिए था.

अगर और खुशी चाहिए हो तो रेलवे एनटीपीसी की परीक्षा में उमड़ी  भीड़ देखना था!

यूपीएसससी लोअर की 600 पदों के सापेक्ष 1100000 से भी ज्यादा लोगों ने आवेदन किया.

रेलवे की एनटीपीसी परीक्षा के लिए तो 2.5 करोड़ के लगभग आवेदन आए.

गत 22 सितंबर को हुई एचएसससी की परीक्षा में भी 16 लाख लोगों की भीड उमडी.

यूपी टेट, सीटेट, बीएड और स्पेशल टेट की परीक्षा में उमडी भीड़ भी किसी लोकप्रिय नेता की सभा में उमडी भीड़ से भी ज्यादा होती है.

खुश होने के लिए हमारे देश में काफी कुछ है, बेरोजगारों की भारी भरकम संख्या हमें मुफ्त में समर्थक और भक्त मुहैय्या करा देती है.

खुशियाँ तब भी होनी चाहिए जब लखनऊ और दिल्ली में कभी पेंशन के लिए कभी प्रमोशन के लिए जुडती लोगों को लाठियाँ मारकर भगाया जाता है.

खुशियाँ इस बात पर भी मनाई जा सकती है कि उत्तर प्रदेश में पिछले ढाई साल में पुलिस और टीचर के अलावा और किसी बिभाग में भर्ती नहीं की गई.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि हम दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों और डिप्रेशन में जीने वाले नौजवानों के देश हैं.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि बीपीएससी में 25 लाख रुपये में अधिकारी की सीट खरीदी जा सकती है.
खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि परीक्षा के अतिरिक्त छात्रों को धरना, प्रदर्शन, कोर्ट, कचहरी की भी तैयारी करनी पड़ती है.

खुशियाँ इस बात की भी मनाई जा सकती हैं कि उत्तर प्रदेश की यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसरों की 50% तक सीटें खाली हैं.

2.5 लाख डाक्टरों, 1.5 लाख प्राथमिक शिक्षकों के पद खाली हैं.

खुशियाँ इस बात की भी कि उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के जेई 2013 का रिजल्ट 6 साल बाद भी नहीं जारी हो सका।

आप समर्थक बने रहिये, लाठी-डंडे खाते रहिए और खुश रहिए कि आपका नेता कितना लोकप्रिय है.      - सोशल मीडिया

                                  ★★★★★★